Friday, May 25, 2012

बहुत सारे अच्छे गानों का पिक्चराइजेशन बुरा है।

सूरत दिखाने के लिए आईने के पार कोई अवरोधक चाहिए। मसलन बात बहुत छोटी सी है कि बॉस का फोन पर फील्ड में काम करते हुए डांटना जैसे स्टूडियो में बैठे एंकर से रिपोर्टर को मिली फटकार। यकायक साढ़े सात रूपए की बढ़ोतरी से पेट्रोल का और ज्वलनशील हो जाना और किसी निम्नमध्यमवर्गीय का अपना मोपेड फूंक देना। अर्थव्यवस्था के कच्चे जानकार का इस खबर को सुन दिली तसल्ली से भर जाना जैसे वैष्णव का मनाना कि लहसन, प्याज और गोश्त के दाम आसमान छूए। इसी क्रम में शराब को हाथ न लगाने वाले गुट का इस हसरत को पालना कि आगामी फरवरी मार्च में वित्त मंत्री का शराब, सिगरेट, पान मसाला और तम्बाकू में कम से कम पचास फीसदी का उछाल।

दस हज़ार अलय बिंबों वाली किताब में एक पैराग्राफ ऐसा जिससे वो प्रिय हो जाए, साढ़े चार घंटे की ब्लू फिल्म वाली डीवीडी में नायिका की एक विशेष भाव भंगिमा जो शरीर और सौंदर्यशास्त्र की कला सकारथ कर जाए। बेहद साधारण उपन्यास में एक पन्ने में बाप का गीली राख लगी देगची का चूल्हे पर चढ़े चावल का अदहन जांचना। बदतमीज़ लहजे में कुछ आत्मीय आवाज़ों की कौंध, लठ्ठमार भाषा में एकआध पंक्ति में प्रेम का अधिकार यूं कि दिल रीझ आए जैसे बहुत सारे मानसिक प्रदूषण के बीच भाषणों में भारत एक महान और विशाल देश है की पहली पंक्ति।

आगामी इतवार पालिका और जनपथ पर खरीदारी के मूड में निकलना हो तो रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों का चुपचाप संसद मार्ग थाने पर उतरना। तभी बायीं ओर चीनी मिल के मजदूरों का बकाया भुगतान की मांग लिए पृथ्वी के आठवें महाद्वीप की ओर बढ़ना, इतवार के सिनेमा दर्शक के लिए यह एक बालकनी का टिकट है।

वहीं, बहुत सारे पिटे हुए फिल्मों का निर्माण सहृदयता से हुआ।

Friday, March 30, 2012

टू व्होम इट मे कंसर्न


देखा गया है कई बार ऐसा भी कि सत्तासीन पार्टी के गुणगान के एवज में अखबारी कागज़ एक उपहार है।

और कागज़ बचाने की मुहिम जब शुरू हुई तब तक संपादकों को प्रिंट आउट के बाद ही उन्हें गलतियां नज़र आने की बीमारी लग चुकी थी। अपनी सरकारी कुर्सी में धंसे संपादक महोदय का दिमाग खबरों को कागज़ बचाने की सारी कवायद तब भी बेकार जा रही है जब समाचार कक्ष से अगली सुबह सफाई के दौरान गैलनो गैलन कागज़, प्लास्टिक कप में बची चाय, पान और तम्बाकू की पीक में लिथड़े निकाले जा रहे हैं। और उनमें कूड़ेदान में पहले तह किए गए फिर ठूंसे गए  कागज़ अगले दिन जब जबरन निकाले जाते हैं तो उनकी शक्ल जंगल में किसी विलुप्त होती प्रजाति से मेल खाती सी लगती है। 

थाने या मेट्रो या जेल या बैंक या काॅलेज की दीवार में ‘जिसपर‘ तथा जिसकी गुमशुदगी का इश्तेहार अभी तक नहीं चिपका है। कि शहरों में मुश्किल से पिशाब करने की जगह तलाशने के बाद पिशाब निकलते रहने और उससे उपजते रिलेक्सेशन के बीच हम दे पाते हैं उन पर ध्यान।

कूड़ेदान में कभी कभी डर से भी डाल दी जाती है बर्बाद हो चुके कागज़ कि वरिष्ठ संपादक देखेंगे तो बहुत संभव है कि नहीं लग सकती है कैजुअल की अगली ड्यूटी या नहीं गिने जा सकते हैं अगली चाय वाले दोस्तों की जमात में या फिर नहीं ही मुस्कुराएगा वो संपादक अगली मुलाकात पर या ड्यूटी कक्ष में फिर से साथ काम करने की अनुशंसा नहीं होगी। इनते सारे डर के बीच भी कई बार चुपके से सुपर्द-ए- ख़ाक हो जाता है कागज़। हालांकि यह तथ्य बहस से परे है कि एडिटर इन चार्ज स्वयं इतने या इतने के दोगुने कागज़ खर्च कर आ रहे हैं।

नाक मुंह सिंकोड़ता है सफाई कर्मचारी कि पढ़े लिखे संपादक ज्यादा बर्बादते हैं कागज़।

अनपढ़ सफाई कर्मचारी द्वारा पच्चीस प्रतिशत छपे अक्षरों से ज्यादा पढ़ी गई है पचहत्तर प्रतिशत सफेद कागज़ का मौन।

Wednesday, March 7, 2012

आवश्यकता है...

जरूरत है एक कवि की
जिसके पास लच्छेदार भाषा हो
जो हर चीज को निहायत जरूरी बताता हो
राह भरमाने में माहिर हो
जिसके बारे में कम से कम जाहिर हो
आकार ऐसा कि ना गद्दी में ना सीप में आता हो
छुप कर रहता हो 
मगर आपकी आंखों को दागता हो
मुसीबत हो या झंझावात
या हो भावनाओं का चक्रवात
रूपिया कमाना हो या फिर पखाना हो
लिखने को मरण तुल्य बताता हो 
लेकिन डिमांड पर कविताएं लिखता हो 
पुन: उसे हाट पर मौजे की तरह दस का दो बेचता हो


आप उसे कुछ भी दिखा दें
देयर्स अ लिटिल बिट ऑफ सेल इन एवरीबडीज़ लाईफ की तर्ज पर 
कविता की पुर्नस्थापना करता हो


जो हवा में मुठ्ठियां भांज दे 
तो वे शब्द आपके दांतों को मांज दे
जन आंदोलन हो या टूथपेस्ट 
उपयुक्त शब्दों से कविता में उसका विज्ञापन कर उसे अर्जेंट बता दे


तर्क हो कुतर्क हो 
अपने लिए सर्तक हो 
दलदल में मुस्कुराता उतरे
डुबकी मार मछली खाए
एकादशी के बाप भी न जाने

महिला हो तो करूण कातर मुखड़ा हो 
जिसकी हर शब्द में पिछली सदी से हो रहा अत्याचार टपके
ऐसा सुनाते हुए अपने शैम्पू किए हुए बाल झटके
पुरूष हो तो फ्रस्ट्रेटेड कवि सा यौनजनित कुंठा हो 
मादा काया देखते ही कनखी से आम आदमी बदले
और स्तनों की गोलाई का अंदाजे से नाप ले

अच्छा खासा नेटवर्क हो 
नर हो या मादा हो मगर जरूरी ये कि
सफेद ब्लाउज सी पहनी हुई विनम्रता हो
जिसके नीचे कसे काले रंग के अंर्तवस्त्र से अहंकार झांकता हो 
सच, ईमानदारी, नैतिकता और प्रेम की झाझ बजाता हो
यदि समकालीन साथी पुरस्कृत हो
हमबिस्तर होने का आक्षेप लगाता हो

कर्मक्षेत्र को शतरंज की बिसात मान
सामने वाले की घोड़े की चाल देख अपनी दुलत्ती लगाता हो

इन शर्तों पर तो मैं खुद को ही खड़ा पाता हूं।
आपमें यह सब नकारते हुए करने की क्षमता होगी
जबकि मैं यह सब स्वीकारता हूं।
बेरोज़गारी की आंधी में,
मैं इसका सर्वोत्तम उम्मीदवार  हूं।
अत: खुद को इस नौकरी पर रखता हूं।

Tuesday, February 21, 2012

फाल्गुन 2, शक संवत 1933। कृष्ण अमावस्या, विक्रम 2068। सौर फाल्गुन मास की 9 प्रविष्टे। उत्तरायण। बसंत ऋतु

भोर का गीला बादल जैसे गीली मिटटी पर पर खड़ा गाँव का घर
वो कहीं फैला हल्का पारदर्शी गुलाबी टुकड़ा जैसे कड़क कर रस्सी से गिर परा कोई गुलाबी दुपट्टा
कहीं एक थक्का रूई रखा हुआ जैसे रात के आँगन में चौकड़ी भरते एक पंख छूटा हंस का
दो तिहाई स्लेटी आकाश
एक तिहाई गदलाया आसमान जैसे बरसाती गंगा

सतह से ऊपर रखा कोई अदृश्य हीरा
अब प्रकाश छान रहा है, छू रही हैं अदृश्य किरणें अब सबकी मुंडेर को
बिना पलस्तर दीवार रात भर ऊँघता, गुटर गूं करता
अपनी बुजुर्गियत झाड़ता, गला साफ़ करता बूढा कबूतर

दो रंग घुलेंगे आपस में अभी तो
कोलर चढ़ा कर एक बच्चा लाल गेंद लिए निकलेगा
प्रेशर कूकर के रबड़ जितनी परिधि में दिन भर आइना चमकाता फिरेगा

एक झुण्ड निकला है पश्चिम से अभी
इतने नन्हे कि जैसे किसी ने अभ्रक के बुरादे उडाये हों

मैं आसमान की नदी में एक बाल्टी डूबा कर
सबकी पत्तल में एक एक कलछुल गीला बादल परोसता हूँ.
किसी प्रवासी पंछी के सफ़ेद फ़र को थोडा सा रंगता हूँ.

एक आदमी का, आदमी के बिना किसी सुबह को देखना अच्छा है.

Wednesday, January 18, 2012

स्टोव


तीन टांगों पर खड़ा, अदना सा बेढब जिस्म वाला 
मेरे घर में विकलाग बैंक के क्लर्क जैसा लगता है 
जो अनुकम्पा की आधार पर नियुक्त हुआ है. 
स्टोव.

जिसके ऊपर की पीतल के रंग छड़ी टेढ़ी मेढ़ी थाली किसी बच्ची के फ्रोक जैसी लगती है 
नीचे कोई प्रसाद की छोटी सी प्लेट 
फिर आग का फुग्गा जलता है 
बीच के खम्बे भूख -पेट के घर की दीवारें
तली एक बुजुर्ग पेट लिए बैठा है 
स्टोव 

सर्दियों में,
जब हमारे अच्छे दिन होते 
(जिस महीने मैं टाई के लिए स्कूल में नहीं पिटता, शीशम पर मिट्टी नहीं  चढ़वानी होती, सायकिल के रिम, टायर और टियूब नहीं बदलवाने होते, बाज़ार में मजबूरी में बेसन खरीदते वक्त मेरी अनपढ़ माँ  की राजनीतिक चेतना नहीं जागती होती और वो नरसिंह राव सरकार को नहीं कोस रही होती)

हम किरोसिन भरवा कर रात भर स्टोव को घेरे रहते  
धीमी -धीमी आंच पर माँ -पापा से कहानियां सुनाते
स्टोव मंद -मंद मुसकाता रहता 
किस्सागोई की परम्परा दौड़ती रहती 
उसकी छातियाँ नुकीली रहती 
दरअसल,
साहित्य से जुड़ाव होना हमारा कोई पुश्तैनी शौक नहीं
अभाव से उपजा एक रोग है.

मैं तलाश रहा हूँ वो किताब जिसमें स्टोव का शब्दांकन ठीक मेरी यादों में बसा जैसा हो.
लेकिन ये अंतर स्क्रीन प्ले और उपन्यास जैसा ही रहा 
ये फर्क किसी चादर के इस्तेमाल के बाद उसपर कब्र बनाने सा रहा 
स्टोव हमारी याद में कुंडली मार कर बैठा है 
जैसे याद में कोई इनारे से झांकता अपना ही चेहरा 

हम मकान मालिक के यहाँ से निकाले जाते 
'किताब के अक्षर छोटे हैं इसलिए पानी आता है'
कि आड़ में  रोने की सहूलियत गढ़ते
अनपढ़ माँ स्टोव के ठीक वासर को खराब बता ज़ोर से आंच देती 
एक निम्न वर्गीय परिवार के औरत का विद्रोह 
अपने करम कूटने जैसा ठक- ठक बजता 
स्टोव बुक्का फाड़ कर धधकने लगता

हालांकि खाना जल्दी पकता 
फिर भी घर में झगडे होते
पिताजी इसी स्टोव (चूल्हे) के जलने का वास्ता देते 
ईश्वर के शुक्रिया अदा करने का पाठ पढ़ाते 

स्टोव प्रतीक बन गया था हमारे अस्तित्व का
जो कोयला फोड़े जाने तक ज़ारी रहा 
और 
मैंने पिस्तौल के दम पर एक गैस चूल्हा लाने की सोची 

माँ के हाथ से गोल हो सिंकती है रोटी 
स्टोव बस उसे पकाता है.
तीन टांगों पर खड़ा अदना सा विकलागं ये क्लर्क   
फिर भी, हमारे घर का पांचवां सदस्य है.

Thursday, November 17, 2011

नज़मा आत्मविरोध में विज्ञापन करती है

बिल्डिंगों के जंगल हैं
रस्सियों पर लटककर चमकीले शीशों की सफाई चलती रहती है
कारोबारी चौराहे के चौपड़ में 
नज़मा दिन भर बैंक के सामने बैठी रहती है

बैंक के आगे बोर्ड लगा है
'चलकर आइये, चलाकर ले जाइए'
दिन भर भीड़ लगी रहती है 
जन संपर्क अधिकारी ग्राहक से दुगना हँसता है
"हाँ सर्दियों की धूप  
चाय की चुस्की लेते हुए अच्छी लगती है"
बैंकों के अब सोफे लगवाए हैं. 
आवास, शिक्षा, इंशोरेंस , ऍफ़ डी सब है
बस आपकी कुव्वत क्या है

नज़मा आत्मविरोध में विज्ञापन करती है
"बैंक दे देता है इतना सब कुछ
मैं क्या दे सकती हूँ - सिर्फ बच्चा !"

"मेरी बस ग़लती इतनी 
ज्यादा उम्र नहीं है मेरी 
आंसू अब सूख चुके हैं
हजारों बलात्कारों से निकला बच्चा 
भूखा, गोद में पैर पटकता रहता है
दूध भी अब नहीं उतरता
अंतर्वस्त्र नहीं समीज के नीचे 
हवलदारों, रेड़ी वालो को सहूलियत इतनी
अँधेरे में जल्दी हो जाता है"

कभी कभी चली जाती है मंदिर में 
शिवलिंग से गलबांही कर पूछती है
या खुदा ! बलात्कार से आये बच्चे से मुहब्बत क्यूँ मुझे ?

श्रीमान ! नज़मा आत्मविरोध में विज्ञापन करती है
"नज़मा और शिवलिंग !
मैं धर्मनिरपेक्षता तो नहीं सिखा रही ?"

कभी कभी मन होता है कहने का उससे
नजमा, तुम भी इस कारोबारी चौक पर 
जिस्म का कारोबार कर लो तो अच्छा है.

लेकिन नज़मा तो आत्मविरोध में विज्ञापन करती है ना सर!

Saturday, October 8, 2011

हमने प्यार को धोखे से चरस खिलाया था

जब भी ज़मीन भारी लगे
हफ्ते भर सर दर्द तारी रहे
गैलन गैलन आंसू रो 
और वो आसमान में घुलता लगे

कोई आहट चुपचाप गुज़रा करे
गौरैये की चहचाहट में उनके कंठ सूखे लगे
गुस्से में कविता लिखने बैठो तो 
सालता सा प्रेम गीत लिखा करो

सहेलियों संग कोफी पीते हुए
गायब हो चुके मुहासों के तार पकड़ 
बगल वाली आंटी 
तुम्हारी बढती उम्र के बायस सवाल पूछा करे 

सो कर उठते ही थकान महसूस हो
जीभ को बुखार हुआ करे
डेरी मिल्क देख मुझे तुम्हारी कमर की महक याद आये
तुम्हारे लिबास का कोई धागा उधडे तो
मेरे कुरते का बटन याद आया करे
गिरती शाम में जलाऊं अगरबत्ती तो 
अफीम रोशन हुआ करे 

नुक्कड़ पर खाओ गोलगप्पे तो 
गैस लाइट के पीछे मैं खुल्ले पैसे जोड़ता दिखाई दिया करूँ
तब पागल हो
जाम लगे चौराहे पर के हर ऑटो में चढ़ना
मारी मारी फिरना

हमने प्यार को धोखे से चरस खिलाया था
रोज़ पूल पे उबकाई करता दीखता है

मैंने आज छक कर शराब पी 
और बहुत तबियत से तुम्हारे हिस्से की भी नमाज़ पढ़ी