पछतावे की आंच

यह पछतावे की आंच है 
दूसरों को 
अपनी जीवन निर्धारण का फैसला सौंपने का

सामाजिक समानता का सपना रख लड़ते लड़ते 
मुझे एहसास हो गया है कि धरती पर जब तक जीवन है 
अन्याय होता रहेगा
बस अब लड़ने की भावना बनाये रखने की बात है 
क्योंकि इधर से साथी कम हो रहे हैं.

यह पछतावे की आंच है जिसमें 
झुलसकर महसूस हो रहा है कि हमने हौसले बढाने वाले वाले गीत नहीं लिखे
हमने मौके मुताबिक बात की, यह गलती की

पछतावा इसका है 
कि हमारी लड़ाई में ठहराव आ गया था.
कि हमें सरपट दौड़ते घोड़ों से गिरते हुए भी उसके गर्दन के बाल पकड़ लेने थे 
कि हमें अपने सबसे प्यारे तोते का कलेजे पर पत्थर रख कर गर्दन मरोड़ देना था.
किताबें जला देनी थी 
मगर हम अच्छा पढने में रह गए. 

यह पछतावे की आंच है 
दोस्त के बहकावे में आकर 
किया गया पहला हस्तमैथुन सा पछतावा
मुसलामानों की बस्ती में अपना झोपडी ना पहचान पाने का पछतावा
हमें लोगों से बहुत उम्मीद थी 
और इस आस में समय रहते 
हमने विरोध नहीं दर्ज कराया.
यह पछतावा है.

वहीँ, दूसरी तरह के लोगों ने 
रात भर रिमांड पर रखने के बावजूद 
अपने फाइल से मेरी गुमशुदगी की रिपोर्ट नहीं हटाई है.
और अब मिलते हर यातना पर पछतावा है.

यह शर्मनाक है कि सारी हदें हमने सिर्फ लिखने में तोड़ी.

17 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार said...

बहुत संदर भावाभिव्यक्ति। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
एक आत्‍मचेतना कलाकार

Kishore Choudhary said...

साल के इन आखिरी लम्हों में दिल को झकझोर देने वाली इस कविता का बहुत शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ. आज इस दुनिया के लिए अपनी नापसंदगी लिखते हुए इस अहसास को जी रहा था कि बहुत समय नहीं हुआ है इसे ख़राब हुए लेकिन दुःख इस बात का है कि हमने वो खो दिया है जिसकी सबसे अधिक जरुरत थी जिसे आपकी ये कविता सुन्दरता से बुनती है. मुझे इस कविता को पढ़ते हुए अपने होस्टल के दिन याद आ रहे हैं कि उन दिनों मैं ऐसा कवि होना चाहता था मगर कभी हो नहीं पाया.

प्रवीण पाण्डेय said...

पछतावे में झुलसना,
जीवन से कुछ न कहना,
सब सहते रहना,

ना ना ना ना,
बस बस बस,

छोड़ दो राह,
मोड़ दो राह,
आज है दिन,
प्रारम्भ कर दिन।

Navin C. Chaturvedi said...

सागर भाई नमस्कार|
आपकी लेखनी ने प्रभावित किया निस्संदेह आप बधाई के पात्र हैं| अच्छा विषय भी चुना है आपने| वाकई या तो विगत वर्षों में सिर्फ़ अच्छा अच्छा लगने वाला लिखा गया, या उस अच्छे अच्छे लगने वाले को ही मंच मिले| मेरा एक शे'र भी आपसे साझा करता हूँ:-
जो जी हजूरी कर रहे, वो कामयाबी पा रहे|
निष्पक्ष जो भी लोग हैं, वो सिरफिरे नाकाम हैं||

हमारे ब्लॉग्स पर भी पधारिएगा:-
http://thalebaithe.blogspot.com
http://samasyapoorti.blogspot.com

वन्दना said...

वहीँ, दूसरी तरह के लोगों ने
रात भर रिमांड पर रखने के बावजूद
अपने फाइल से मेरी गुमशुदगी की रिपोर्ट नहीं हटाई है.
और अब मिलते हर यातना पर पछतावा है.

यह शर्मनाक है कि सारी हदें हमने सिर्फ लिखने में तोड़ी.



बडा गहरा और सोचने को मजबूर कर दिया…………गज़ब की सोच का परिचायक्।

Kailash C Sharma said...

बहुत सार्थक रचना..आज के हालात पर सटीक टिप्पणी..बहुत सुन्दर

खबरों की दुनियाँ said...

अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

अनुपमा पाठक said...

सार्थक रचना!

रवि कुमार said...

पहली बार इस तेवर की कविता देखी है आपके यहां...
क्या खूब कहा है...

यह शर्मनाक है कि सारी हदें हमने सिर्फ लिखने में तोड़ी....

neera said...

कुछः कहते नहीं बन रहा ...सिर्फ आंच में सुलगने और दो बार कविता पढने के अलावा....

पछतावा इसका है
कि हमारी लड़ाई में ठहराव आ गया था.
कि हमें सरपट दौड़ते घोड़ों से गिरते हुए भी उसके गर्दन के बाल पकड़ लेने थे
कि हमें अपने सबसे प्यारे तोते का कलेजे पर पत्थर रख कर गर्दन मरोड़ देना था.
किताबें जला देनी थी
मगर हम अच्छा पढने में रह गए.

ओम आर्य said...

पीछे जाकर तीन कवितायेँ पढ़ी.
भाई मेरी दुआ लग गयी है, लेखनी खूब फुर्सत पा रही है. साधुवाद.

खुशदीप सहगल said...
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खुशदीप सहगल said...

सुदूर खूबसूरत लालिमा ने आकाशगंगा को ढक लिया है,
यह हमारी आकाशगंगा है,
सारे सितारे हैरत से पूछ रहे हैं,
कहां से आ रही है आखिर यह खूबसूरत रोशनी,
आकाशगंगा में हर कोई पूछ रहा है,
किसने बिखरी ये रोशनी, कौन है वह,
मेरे मित्रो, मैं जानता हूं उसे,
आकाशगंगा के मेरे मित्रो, मैं सूर्य हूं,
मेरी परिधि में आठ ग्रह लगा रहे हैं चक्कर,
उनमें से एक है पृथ्वी,
जिसमें रहते हैं छह अरब मनुष्य सैकड़ों देशों में,
इन्हीं में एक है महान सभ्यता,
भारत 2020 की ओर बढ़ते हुए,
मना रहा है एक महान राष्ट्र के उदय का उत्सव,
भारत से आकाशगंगा तक पहुंच रहा है रोशनी का उत्सव,
एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें नहीं होगा प्रदूषण,
नहीं होगी गरीबी, होगा समृद्धि का विस्तार,
शांति होगी, नहीं होगा युद्ध का कोई भय,
यही वह जगह है, जहां बरसेंगी खुशियां...
-डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

नववर्ष आपको बहुत बहुत शुभ हो...

जय हिंद...

खुशदीप सहगल said...
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डॉ .अनुराग said...

आखिरी पांच लाइने सीधी जमीर पे गिरती है .....ओर कैमरा गर उन्हें ही फोकस कहकर कविता के दायरे में रखेगा .....मुझे कोई इतराज नहीं होगा .....

अपूर्व said...

यह कविता हमारे जैसे ’आम’ और ’जागरुक’ नागरिकों के लिये है..जो अपनी कायरपन को कलम तले और दुम को टांगों तले छुपाये फिरते हैं..अपने वक्त की गवाही देने से मुकरते वक्त हमारी आंखों मे अपने बच्चों के लिये खौफ़ होता है तो अपने पुरखों के लिये लाचारगी..मगर जिंदगी इन सबके बावजूद चलती है..और चीजों को बदले बगैर भी जिंदा रहा जा सकता है..मगर जिस दौर मे जिंदा रह पाना ही एकमात्र शर्त रह जाय..उस वक्त मे जिंदगी से शिकायत भी एक विलासिता ही लगती है..इस हार्ड-हिटिंग कविता पे एक अन्य पसंदीदा कविवर की पंक्तियां कौंधती हैं

अफ़सोस कि हम सृष्टि के सबसे शांत समय में पैदा हुए.
कुछ न हो पाने की वजह से आत्महत्या कर लेना.
ऐसे ही फॉर अ चेंज !

vandana khanna said...

saari hade humne likhne me he todi..aise lag raha hai k kavitaon ki koi behad kitaab pad rahi hoon, jab bhi band karne lagti hoon koi paana hath pakad ke sath chalne ki jid karne lagta hai.....